विरोध के लिए विरोध के बजाय सृजनात्मक, सक्रिय, सकारात्मक सोच की जरूरत —पीडब्ल्यूएस प्रमुख आर के पाण्डेय।

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विरोध के लिए विरोध के बजाय संरचनात्मक सोच की जरूरत —आर के पाण्डेय।

पर्दाफाश न्यूज टीम। —केवल विरोध विनाशकारी। —सृजनात्मक सोच के लिए राष्ट्रीय मुहिम की जरूरत। नैनी, प्रयागराज, 04 जनवरी 2021। विगत एक दशक से भारत में मात्र विरोध के लिए हर कीमत पर विरोध की उतपन्न परिस्थिति ने भयावह विनाशकारी स्थिति उतपन्न कर दी है जबकि राष्ट्रहित व जनहित में सकारात्मक सोच के साथ सक्रिय भूमिका में सृजनात्मक विचार की आवश्यकता है। उपरोक्त विचार रखते हुए पीडब्ल्यूएस प्रमुख आर के पाण्डेय एडवोकेट ने मीडिया से कहा कि यह अत्यंत दुखद व शर्मनाक है कि विगत एक दशक में उतपन्न विरोध की इस परिस्थिति में राजनैतिक दलों व उनके समर्थकों को इतना संज्ञाशून्य कर दिया है कि वे सही व गलत का निर्णय किये बिना केवल विरोध के लिए विरोध करते हैं जिसका परिणाम सम्मानित व्यक्तित्व के लोगों के लिए पप्पू, फेकू, टोटीचोर, खून का दलाल, देशद्रोही, रिवार्ड वापसी-टुकड़े-टुकड़े सबूत गैंग आदि शब्दों का खुलेआम प्रचलन हो गया है। बेहद अफसोसजनक तो यह है कि इस विरोध में वे लोग भी शामिल हैं जोकि कश्मीरी पंडितों पर अमानवीय अत्याचार व राज्य से बेदखली, सिक्खों के नर संहार, गोधरा कांड में ट्रेन को घेरकर यात्रियों को जलाकर मार डालने, मेरठ दंगे व जहरीली जातिवादी वोट बैंक की नीच राजनीति, मजहबी उन्माद व तुष्टीकरण में शामिल या मौन समर्थक रहे हैं। इससे भी खतरनाक स्थिति तब बन जाती है जब अपने शासन काल मे चीन को जमीन कब्जा करा देने वाली पार्टी आज चीनी कब्जे के झूठे इल्जाम लगाती हैं व जातिवादी मानसिकता के नेता निर्धन बेसहारा सवर्णों पर हो रहे अन्याय पर मौन रहते हैं। आज सभी राजनैतिक दलों व समाजसेवियों को सोचना ही होगा कि वे जातिवादी सोच से ऊपर उठकर सभी भारतीयों व राष्ट्र के कल्याण की बात करें। सरकार को यह तय कर होगा कि सवर्ण इसी देश के समान नागरिक हैं तो उनके साथ भेदभाव क्यों? रणनीतिकारों को जातिवादी रणनीति के बजाय राष्ट्रवादी रणनीति बनानी होगी। अगर जल्द इन समस्याओं का समाधान न किया गया तो प्रभावित व पीड़ित लोग स्वयं सामने आकर दूसरी आजादी की महाक्रांति को मजबूर हो सकते हैं जिसे सम्हालना सरकार व जवाबदेह लोगों के लिए असम्भव हो जाएगा। इसलिए परिस्थितियां बिगड़ने से पहले भारतीय सरकार, विभाग, रणनीतिकार, समाजसेवी व प्रबुद्ध वर्ग को अपनी सोच को राष्ट्रहित्कारी बनानी होगी व देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान रणनीति व विरोध से पहले चिंतन तथा तथ्यात्मक एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुपालन करना सीखना ही होगा।

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