न्यायालय व सरकरीं मशीनरी की सुस्ती से ग्राम सभा की जमीन पर कब्जा जारी

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समाजसेवी ने ग्रामसभा की जमीन कब्जा कर रहे भूमाफियाओं के विरूद्ध ज्वाइंट मजिस्ट्रेट को शिकायती पत्र सौंप कर की कार्यवाही की मांग
हाईकोर्ट में लम्बित मुकद्दमें के बाद भी ग्रामसभा की 22बीघे जमीन की हो रहे बिक्री व स्थाई निर्माण पर रोक लगाते हुए मुकदमा दौरान हुए बैनामें को निरस्त कर जमीन का उपयोग सामाजिक कार्यों हेतु किये जाने की मांग करते हुए समाजसेवी चन्द्रमणि पाण्डेय सुदामाजी ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा को शिकायती पत्र देकर बताया कि ग्रामसभा संग्रामपुर में स्थित सहरायें गांव के निवासी राम किशुन जिनके महज दो लडके भगवान दत्त व ईश्वरी थे किन्तु इन दोनों की कोई औलाद नहीं थी इनमें से भगवान दत्त की मौत पिता से पहले हो गई फलताः पिता की सम्पत्ति ईश्वरी को मिली जिनकी सेवा व क्रिया कर्म रामलौट,उदयराज व लालमणि पाण्डेय ने किया किन्तु जमीन किसी के नाम वसीयत न होने के चलते जमीन के कई वारिस खडे हो गये जिनमें से तत्कालीन चकबन्दी अधिकारी(COR) सम्पूर्ण सिंह ने किसी को असली वारिस सिद्ध न होने के चलते 30/07/83को अपने आदेश में उक्त जमीन को ग्राम सभा घोषित कर दिया उक्त फैसले के विरुद्ध रामफेर पुत्र उदयराज ने खुद को भतीजा व रामप्यारे पुत्र राम सिहिट ने खुद को भांजा बताते हुए ( SOC) के यहां वाद दाखिल किया जहां पर राम प्यारे ने तत्कालीन ग्रामप्रधान रामसरन यादव व विपक्षी रामफेर को लालच देकर फैसला अपने पक्ष में करा लिया फलताः 02/05/86को फैसला रामप्यारे के पक्ष में हुआ जिसके विरुद्ध रामफेर के छोटे भाई रामयज्ञ द्वारा डी.डी.सी.के यहां वाद दाखिल करते हुए राम प्यारे के फर्जी दस्तावेजों के विरुद्ध पेश तथ्यपूर्ण सबूतों के आधार पर डी.डी.सी. वी.के.त्रिपाठी ने माना कि रामप्यारे मृतक ईश्वरी के भांजे नहीं हैं क्योंकि सरकारी सजरे में मृतक की कोई बहन नहीं जबकि सरकारी सजरे के अनुसार रामप्यारे का ननिहाल फैजाबाद के औन्दहा में है इतना ही नहीं रामप्यारे के कूट रचित साक्ष्यों के अनुसार रामप्यारे की कथित मां की मृत्यु 1936में जबकि रामप्यारे का जन्म 1939में होना पाया गया फलताः 28/01/93के अपने फैसले में डी.डी.सी.ने साक्ष्यों को बेमानी करार देते हुए ग्रामप्रधान के बयान को भी यह कहकर नकार दिया कि ग्रामप्रधान ग्रामसभा का रक्षक होता है न कि भक्षक उसे कलेक्टर की अनुमति के बिना ग्रामसभा के विरुद्ध बयान का अधिकार नहीं है और उक्त जमीन को ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का आदेश दिया जिसके विरुद्ध रामप्यारे ने खुद हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर खतौनी व भ्रष्ट अधिकारियों के मिलीभगत से समस्त जमीन को अनेक लोगों को बैनामा कर दिया जिसके विरूद्ध हमने वर्ष 2002-03में तत्कालीन जिलाधिकारी अनिल कुमार व मण्डलायुक्त श्री देवशरण यादव से शिकायत कर हाईकोर्ट का निर्णय न आने तक उक्त जमीन पर किसी भी प्रकार के कब्जे व बिक्री पर रोक लगाने की मांग की फलताः जमीन पर कब्जा तो बंद रहा मगर जमीन की बिक्री चलती रही इस बीच एक दो लोगों ने कृषि कार्य शुरु किया कुछ पडी जमीन पर ईंट की पथाई शरू हुई और अब तो बीते एक जून से पक्का निर्माण शुरू हो गया है।उन्होने प्रसासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खडा करते हुए कहा कि
1-बीस बीघे कीमती जमीन को लेकर भूमिप्रबन्ध समिति के अध्यक्ष ग्राम प्रधान, उपजिलाधिकारी व जिलाधिकारी बस्ती सहित सरकारी वकील ने क्या कदम उठाया ?
2-जिस जमीन का मुकदमा 1969से निरन्तर चल रहा है उसकी बिक्री व खारिजदाखिल कैसे हो रहा है?
3-हाईकोर्ट में लम्बित मुकद्दमा जिसमें भूमिप्रबन्ध समिति बस्ती प्रतिवादी है उसमें स्थाई कब्जा किन परिस्थितियों में हो रहा है?
4-यदि भूमिप्रबन्ध समिति को जमीन की सुरक्षा नहीं करना तो भूमिप्रबन्ध समिति के पक्ष में फैसले का क्या लाभ?
5-क्या प्रसासन को सरकारी धन व जमीन का उपभोग ही करना चाहिए या सुरक्षा भी?
6-हाईकोर्ट में 18/03/93को दायर अपील के उपरांत उभयपक्षों का सकृय न होना न्याय प्रकृया का दुरुपयोग व न्यायिक कार्य में बाधा है ऐसे प्रकरण ही न्याय से विश्वास को कमजोर करते हैं।
7- क्या निराश्रित का सेवा करने वाले को उसकी सम्पत्ति नहीं मिलनी चाहिए क्यों न उक्त जमीन को उनकी सेवा व क्रिया कर्म करने वाले मृतक के वंशजों को दे दिया जाये। ताकि निराश्रितों के प्रति सेवा भावना कायम हो
उन्होने मांग किया कि उक्त जमीन पर कृषि या निर्माण किसी प्रकार के कब्जे को रोकते हुए तथ्यों को छुपाकर मुकदमा दौरान हुए समस्त बैनामें को निरस्त कराते हुए उक्त जमीन का उपयोग सार्वजनिक कार्य हेतु करने के लिए विधिक कार्यवाही सुनिश्चित हो ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने तत्काल अग्रिम आदेश तक निर्माण रोकने का आदेश एस.ओ.हर्रैया को दे दिया

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