बढ़नी के रज़ा ज़ामा मस्जिद से मुसलमानो के लिए जारी हुआ पैग़ाम, लॉकडाउन के वजह से घरों में ही करें इबादत

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निजामुद्दीन सिद्दीकी की रिपोर्ट
बढ़नी, सिद्धार्थनगर

शब-ए-बरात इस्लाम की 4 मुकद्दस रातों में से एक है। जिसमें पहली आशूरा की रात दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बरात और चौथी शब-ए-कद्र होती है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार यह रात साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शुरू होती है। शब-ए-बरात दो शब्दों, शब और बरात से मिलकर बना है, जहां शब का अर्थ रात से है वहीं बरात का मतलब बरी होना है।

मुसलमानों के लिए यह रात बेहद फजीलत (महत्वपूर्ण) रात मानी जाती है, इस दिन विश्व के सारे मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं, वे दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं, वहीँ
जामिया अहले सुन्नत ईशाअतुल इस्लाम बढ़नी के नायब प्रिंसिपल मौलाना बेलाल अहमद क़ादरी व मौलाना अज़मत अली सक़ाफ़ी के अनुसार इबादत, तिलावत और सखावत (दान-पुण्य) के इस त्योहार पर मस्जिदों और कब्रिस्तानों में खास सजावट की जाती है।

मस्जिदों व घरों पर विशेष रोशनी की जाती है, वहीं, बुजुर्गों व अजीजों की कब्रों पर चिरागा कर दुरूद और दुआओं के साथ इसाल-ए-सवाब पेश किया जाता है,उन्होंने कहा कि इस रात को मुस्लमान अपने उन परिजनों, जो दुनिया से रूखसत हो चुके हैं, उनकी मगफिरत की की दुआएं की जाती है,उन्होंने इस मुबारक मौके पर सभी को मुबारकबाद देते हुए अपील किया है की लॉकडाउन के नियमों का पालन करें और अपने घरों पर अल्लाह की इबादत करें।

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