गुरु की तपोभूमि स्थल में पतविंदर का सरोपा से सम्मान

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आर के पाण्डेय की रिपोर्ट
प्रयागराज

तीर्थराज प्रयाग ऋषियों की तपोस्थली रही है इस पावन धरा को श्री गुरु तेग बहादुर तथा खालसा पंथ के संस्थापक अध्यात्म काव्य. एवं शौर्य पराक्रम के प्रतीक गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन दर्शन से जुड़ने का भी गौरव प्राप्त रहा है यही सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी प्रकाश( मां के गर्भ) में आए तकरीबन 353 वर्ष पूर्व विक्रमी संवत 1723 अर्थात 1666 को तीर्थराज प्रयाग में गुरु तेग बहादुर का संगम नगरी में आगमन हुआ था वह स्थान आज अहिल्यापुर मालवीय नगर में श्री गुरुद्वारा पक्की संगत के नाम से प्रसिद्ध है गुरुद्वारा पक्की संगत में आज भी गुरु के शंख. चौकी गुरु तेग बहादुर जिस चौकी पर बैठकर धर्म चर्चा करते थे उसका पाया भी मौजूद हैं इसके अलावा उनका शंख. कृपा एवं ऐतिहासिक कुआ हर किसी की श्रद्धा का केंद्र है
गुरुद्वारा पक्की संगत के प्रमुख महंत ज्ञान सिंह जी ने पतविंदर सिंह को सरोपा भेंट करते हुए कहां की समाजसेवी सरदार पतविंदर सिंह की वर्षों से निरंतर समाज में दिग्भ्रमित तत्वों को हिंसा के मार्ग त्यागने. संप्रदायिक द्वेष एवं क्षेत्रीय वैरभाव को हतोत्साहित करने .देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर बल भाईचारे की भावना विकसित .सहनशीलता .राष्ट्रीय एकता तथा दृढ़ता के उद्देश्य से समाज की रचनात्मक शक्तियों को एकजुट करने .उन्हें नेतृत्व प्रोत्साहन मुखरता प्रदान करने के लिए धार्मिक .भारतीय. जातीय भेदभाव से ऊपर उठकर विभिन्न समुदायो से बीच में राष्ट्रीय एकता तथा सद्भावना का प्रसार सांस्कृति बंधनों पर बल देश में रहने वाले लोगों के बीच राष्ट्रीय एकीकरण. सांप्रदायिक सद्भाव की नई स्फूर्ति .नवचेतना का संचार करते आ रहे हैं राष्ट्रीय एकता के प्रति भावना कर्मठता युवाओं व समाज के लिए अनुकरणीय है यह कुशल. कर्मठ उत्साहित .उत्सुक समर्पित समाजसेवी हैंl
ज्ञानी निशान सिंह जी ने कहा कि गरीब. अज्ञानी .निरक्षर लोगों की सेवा करना मानव धर्म है मानव की सेवा करने का मतलब वाहे गुरु की सेवा करना है पतविंदर सिंह बहुत अच्छा सराहनीय कार्य कर रहे हैं। रागी किशन सिंह जी ने कहा कि ने यह सम्मान गुरु घर आने वाले सच्चे हृदय से हर इंसान का है जो समाज में सामाजिक जागरूकता का कार्य कहीं भी .किसी भी रूप. किसी भी स्तर पर कर रहा हैl
समाजसेवी सरदार पतविंदर सिंह ने उपस्थित संतो को तहे दिल से कोटि कोटि प्रणाम करते हुए कहा कि जिन्होंने मुझे इस काबिल समझा मुझे भगवान हिम्मत और साहस दे जिससे मैं प्राणी मात्र की सेवा कर सकूं।

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