आधुनिक गतिशील समाज में नष्ट-भ्रष्ट होती समाजिक मर्यादाएं

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आर के पाण्डेय की विशेष रिपोर्ट

ऐसे समाजिक परिवर्तन जो समाज को सकारात्मक दिशा में गन्तव्यवित कर उसे प्रगति, स्वस्थता, कर्तव्यपरायणता, योग, जप,
तप, ज्ञान, बुद्धि, बल, विवेक, पौरुषता, निष्कलंकता, पवित्रता, शम (मन का निग्रह), दम (इंद्रियों का निग्रह) आदि प्रदत्त करके सम्पूर्ण प्राणियों की अस्तिवसीनता को सहज, सरल व सुखद बनाते हुए हमारे जीवन को हर्ष, उत्साह व आनन्द से परिपूर्ण कर दें वे अत्यंत पूजनीय व वन्दनीय होते हैं,परन्तु ऐसे परिवर्तन जो हमें काम,क्रोध, मोह,लोभ, क्षोभ, राग, द्रोह, कपट, दम्भ, माया, अमर्ष, ईर्ष्या, द्वेष, अज्ञान, पाखण्ड आदि जैसी अन्तः करण की मोहनी वृत्तियां अथवा हमारी प्रकृति व पर्यावरण को नष्ट भ्रष्ट करके सम्पूर्ण प्राणियों के जीवन को आसन्नसंकटपूर्ण बनाते हुए हमारे जीवन में दुःख,पीड़ा व सन्ताप को प्रादुर्भित करने वाले हों, निश्चित रूप से अति निन्दनीय व दुर्भाग्यपूर्ण होते हैं।

कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति बिना अन्न व जल के रह सकता है,अपने अंग प्रत्यंगों को क्षत-विक्षत होते देख सकता है,परन्तु अपने सम्मान व स्वभिमान को विखण्डित होते नहीं देख सकता है,इतिहास ऐसे बीर व स्वाभिमानी पुरुषों के उदाहरण से भरा पड़ा है।

हमारी बेटियां भी हमारा गर्व होती हैं,सम्मान होती हैं,ये जब जन्म लेती हैं,तभी से इनके जन्म को हम माता लक्ष्मी का अवतरण समझकर अत्यधिक हर्षानुभूति करते हैं,फिर जैसे जैसे बड़ी होती हैं,इनका एक एक प्यार व दुलार हमें अतिशय सुख पहुंचाता है,इनकी प्रत्येक मांग को हम प्राथिमकता से पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं,इनके लिए जब कहीं पर कोई वस्त्र,गहने या कोई अन्य सामान हमें दिखता है,तो हम अत्यधिक हर्ष से उसे उसके लिए ले आते हैं।

यह सब कुछ करने में बेटियों की माँ अर्थात बेटियों की मताएँ भी बेटियों की खुशी के लिए अपने सुख का भी परित्याग कर देती हैं,उनके मलमूत्र को सुव्यवस्थित करने से लेकर उनके भोजन,वस्त्र,शिक्षा-दीक्षा आदि का वे पूर्ण ध्यान रखती हैं,किसी भी दिशा से कोई भी बाधा व कठिनाई को वे अपने ऊपर ले लेतीं हैं,परन्तु वे अपनी लाड़ली बेटियों पर किसी भी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं आने देती हैं।

इतना कुछ होते हुए भी जब हमारी बेटियाँ अज्ञानतावश,भाववश, नासमझीवश,सँगतिवश अथवा किसी असम्यक प्रभाववश वे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ शादी-विवाह व सहवास करती हैं,जिनसे ये सब कुछ करना मात्र निषिद्ध ही नहीं होता अपितु उनके अपने स्वयं के जीवन को भी रसातल में ले जाने वाला होता है।

इन सब कार्यों को बढ़ावा देने में हमारे चलचित्र जो कि समाज को अच्छी दिशा में ले जाने के लिए अपने को सर्वोत्कृष्ट संसाधन बताते हैं,वे भी सबसे अधिक दोषी होते हैं, अधिकांश फिल्मों में एक निम्न व गरीब जाति का लड़का होता है,जो सभी सद्गुणों को धारित करने वाला व त्याग व तपस्या की प्रतिमूर्ति होता है,और जो धनवान व उच्च वर्ग का व्यक्ति होता है,वह सम्पूर्ण आसुरी प्रवित्तियों को धारण करने वाला अत्याचारी व्यक्ति होता है,अन्त में झूठे वासना को जीत मिलती दिखाई जाती है,जो हमारे बच्चियों के मन में अत्यधिक बुरा असर डालती है।

आज कोई भी ऐसा चैनल नहीं है,जिसे हम परिवार के साथ बैठकर देख सकें, निर्लज्जता को आधुनिकता का नाम दिया जा रहा है,जो अत्यंत दुःखद विषय है,शादी-विवाह व पार्टियों में भी ऐसे गाने बजाए जाते हैं,जो 85% लोगों को बुरे व कर्णपीड़ादायी लगते हैं,परन्तु 15% मदमस्त लोग आधुनिकता के नाम पर उन्हें सुनते हैं,व दूसरों को सुनने पर मजबूर करते हैं,जो कि अत्यंत गलत है,हमारी सरकार को भी इसपर कड़े नियम बनाने ही होंगें।

हमारी फूल सी बच्चियों से यही प्रार्थना है,कि वे जीवन पर्यन्त अपने माता-पिता घर परिवार आदि के लिए फूल सी ही बनी रहें,उनके माता-पिता उन्हें जब भी देखें उनका हृदय हर्ष से परिपूर्ण हो उठे,क्योंकि वे किसी का ऐसा सम्मान होती हैं,कि यदि वह चला जाय, तो उन्हें इस धरती पर लाने वाले उनके माँ बाप ही इस दुनिया में न रहें, अर्थात वे अपने माँ बाप की मृत्यु का कारण बने।

वो पल भर का सुख जिसके लिए वे ऐसे गलत कृत्य करने को आतुर रहती हैं,अनेकों वर्षों के अपने पारिवारिक जनों के प्रेम को वे खो देती हैं,व जाने अनजाने में बहुत बड़ी भूल करती हैं,क्योंकि वे जो करती हैं,वो वास्तव में प्रेम न होकर एक वासना होती है, और वासना की तृप्ति के बाद संसार का सबसे सुन्दर पुरूष अथवा नारी आपको प्रिय नहीं लगती है।

15 वर्ष से 25 की आयु ऐसी होती है,जिसमें हमारी बेटियाँ अपने भविष्य को ऐसा निखार सकती हैं, कि उनका सम्पूर्ण जीवन सुखद हो जाय,परन्तु यही ऐसी भी आयु होती है,जिसमें वे अपने तथा अपने परिवार के जीवन को अंधकार में डाल सकती हैं,यहाँ तक कि अनेकों पीढ़ियों तक अपने घर परिवार की मान-मर्यादा कलंकित कर सकती हैं।

इसी प्रार्थना के साथ कि बच्चियां अपना जीवन इसी आयु में सँवार कर पूरा जीवन सुखद कर लें, और अपने कुल की मान मर्यादा को सातत्य रूप से अक्षुण्ण रखें, और उनके माता-पिता से यह अनुरोध है,कि आधुनिकता के नाम पर उन्हें ऐसी चीजों से पृथक रख्खें जो हमारी मान मर्यादा को धवलधूरित करने वाले हों, तथा उन्हें खूब प्यार व दुलार दें।

(लेखक इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता व एनजीओ संचालक है।)

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