जल की ज्वलन्त समस्या- गायब जल, दुखमय कल

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आर के पाण्डेय की रिपोर्ट
प्रयागराज

हिंदी काव्य साहित्य के चर्चित कवि रहीम जी ने बहुत पहले ही अपनी रचना में कहा था- रहिमन पानी रखिये, बिन पानी सब सून। जोकि आज उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद के पाठा क्षेत्र में सच साबित हो रहा है।
प्रयागराज एक ऐतिहासिक, पौराणिक व धार्मिक जिला है जिसका एक भाग गंगापार लहलहाती फसलों व सम्पन्न इलाके के लिए जाना जाता है तो दूसरा बड़ा भाग यमुनापार सूखा व पिछड़ा इलाका। इसमें भी पाठा क्षेत्र जोकि कभी रमणीय, मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्यमय व लहलहाती फसलों के लिए जाना जाता था परन्तु अब यही पाठा क्षेत्र प्राकृतिक जल स्रोत के अभाव, बचे जल के तेजी से घटते जल-स्तर व सरकारी मशीनरी के उपेक्षा का शिकार हो गया है तथा तेजी से सूखे व वीरान हो रहे पाठा क्षेत्र के नागरिक जल के अभाव में अपने दुखद भविष्य की कल्पना मात्र से सिहर जा रहे हैं।
प्रयागराज के यमुनापार में पाठा क्षेत्र का समूचा क्षेत्र वर्षों से जल के अभाव में कृषि योग्य जमीनों को बंजर होते देख रहा है। हालात इतने खराब है कि पूरे इलाके के इंडिया मार्का हैंड पम्प व ट्यूब वेल फेल है तो नहरों में भी पानी नही आता वही प्रकृति जल स्रोत तालाब भी तेजी से गायब हो रहे हैं। यहां के नागरिकों की वर्षो पुरानी मांगों नहरों की सफाई, नहरों में टेल तक जल की निरंतरता व तालाबो का संरक्षण आदि पर किसी भी सरकार में व किसी भी जन प्रतिनिधि द्वारा न तो कोई सुनवाई होती है व न ही इस बावत कोई सरकारी योजना ही है। हर बार चुनावों में लंबे भाषण व आश्वासन देकर वोट लेने वाले जीते जन प्रतिनिधि अगले चुनाव के पहले क्षेत्रवासियों की इस समस्या पर ध्यान तक नही देते। समस्या इतनी गम्भीर है कि अब तो पीने के पानी के अभाव में लोगो का जीना दुश्वार होने जा रहा है।
इस क्षेत्र के जल समस्या आदि के लिए कई बड़ी समितियां जैसे यमुनापार विकास मंच व यमुनापार संघर्ष समिति आदि बनी जोकि लाखों सदस्यों के जुड़ने का दावा करती है व हर चुनाव से पहले राजनैतिक दलों व नेताओं पर दबाव बनाने का प्रयास भी करती हैं परन्तु इन सबके प्रयास भी ढाक के तीन पात बन गए हैं जबकि इस क्षेत्र ने कई राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को भी राज्य व केंद्र में सत्ता तक पहुँचाया है।
इस क्षेत्र की इस गम्भीर जल-समस्या के निवारण का रास्ता न अख्तियार किया गया तो वह दिन दूर नही जबकि समूचा पाठा क्षेत्र वीरान हो जाएगा व यहां के निवासी दूसरे जिले में पलायन को मजबूर होंगे।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व हाई कोर्ट इलाहाबाद के अधिवक्ता हैं।)

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