जयराम आश्रम हरिद्वार में श्रीरामकथा का दिव्य आयोजन, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कथाकार श्री मुरलीधर जी महाराज को पर्यावरण का प्रतीक रूद्राक्ष का पौधा किया भेंट

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आर. के. पाण्डेय की विशेष रिपोर्ट
ऋषिकेश

जयराम आश्रम, हरिद्वार में श्रीराम कथा मर्मज्ञ कथाकार श्री मुरलीधर जी महाराज के मुखारविंद से हो रही है। आज श्री राम कथा के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सहभाग किया।
श्रीराम कथा का आयोजन जयराम आश्रम भीमगोडा, हरिद्वार में हो रही है। श्रीराम कथा की गंगा जयराम आश्रम में सात दिनों तक प्रवाहित होते रहेगी। कथाकार मुरलीधर जी महाराज ने भगवान शिव और माता पार्वती के प्रसंग पर प्रकाश डाला।
श्रीरामकथा के अवसर पर परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्रीराम भक्तों और श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुये कहा कि उत्तराखंड, दिव्य भूमि है, ऋषियों की भूमि है अध्यात्म और शान्ति की भूमि है। गंगोत्री और यमनोत्री के कपाट खुलने के पश्चात केदारनाथ और बद्रीनाथ के भी कपाट खुलने वाले है इन दिव्यधामों के कपाट खुलने के साथ हमारे दिमाग के भी कपाट खुले ऐसी प्रभु से प्रार्थना है। उन्होने कहा कि अब समय अपने-अपने दिल के कपाट खोलने का है; अपनी आँखे खोले ताकि हम प्रकृति के प्रति और सजग हो सके; दयालु हो सके; संवेदनशील और सृजनशील हो सके। स्वामी जी महाराज ने कहा कि हनुमान चालीसा में कहा है ’’अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता’’ मुझे लगता है अब अष्ट प्रकृति को अष्टसिद्धि नहीं बल्कि अष्टशुद्धि की जरूरत है यह हमारे जीवन और व्यवहार में हो। उन्होने कहा कि नवनिधि तो ठीक है परन्तु अब नवधा भक्ति की भी जरूरत है जिससे हम अपने जीवन को परिपूर्ण बना सकते है क्योंकि भक्ति ही जीवन में शक्ति प्रदान करती है; भक्ति ही जीव का परमात्मा से एकाकार कराती है और भक्ति ही जीवन को सम्पूर्णता प्रदान करती है और यही भक्ति की शिक्षा हमें श्रीराम कथा से प्राप्त होती है।
श्रीराम कथा के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को माँ गंगा को स्वच्छ रखने का संकल्प कराया तथा प्रकृतिमय जीवन जीने का संदेश दिया। उन्होने कहा कि प्रभु श्रीराम ने वन में रहते हुये वनों का संरक्षण और वन्यप्राणियों के संरक्षण का संदेश दिया आईये हम सभी श्री राम कथा से यह शिक्षा लेकर जाये और प्रकृति के प्रति जो हमारी जिम्मेदारी है उसका निर्वहन करे तथा प्रकृति के प्रति करूणामय व्यवहार करे।
कथाकार श्री मुरलीधर जी महाराज ने कहा कि श्री राम कथा वास्तव में शौर्य की, पराक्रम की, प्रकृति संरक्षण की और असुरी शक्तियों के विनाश की कथा है। आज के समय में असुरी शक्तियाँ बाहर से अधिक मनुष्य के दिमाग में है। पहले राक्षस हुआ करते थे आज विचारों में राक्षसी प्रवृतियां है जिससे समाज किसी न किसी रूप से प्रदूषित हो रहा है। इसे समाप्त करने के लिये हमें बच्चों को बचपन से ही संस्कार देने होंगे। श्रीराम कथा हमें समर्पित जीवन जीने की शिक्षा देती है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कथाकार श्री मुरलीधर जी महाराज का अभिनन्दन करते हुये रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया।

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